छत्तीसगढ़ की प्रतिनिधि लोककथाएं व कहानियों का संकलन

लेखकीय...

मोर लेखन के सुरूवात छत्तीसगढ़ राज बने के बाद होइस। वइसे आगू घलो मैं स्कूल म पढ़त रेहेवं तब कार्यक्रम म भाग ले खातिर कविता, भासन, निबंध लिखवं अउ ओला बोलवं। फेर ये लिखई ल मैं अपन लेखन के सुरवात नइ मानवं, ह बीज जरुर रोपित होगे रिहिसे। राज बने के बाद चारों मुड़ा छत्तीसगढ़ी के सोर बगरत देखके मोरो भीतर के लेखक ह उमियागे। अपन कलम ल कोनो खास विधा म नइ बांधे हवं जेन डहर के विचार उमड़थे उहे मोर लेखनी रेंग देथे। कहिनी, कविता, बियंग, नाटक, गीत, लेख, खबर, शोध अब आगू अऊ का-का सिरजन होही बेरा बताही।
2000-01 म मैं रंगमंच ले जुड़ेवं अउ संग म कुछू कहीं लेखन घलो करत रेहेवं। इही दरी मे आकाशवाणी रायपुर के डेहरी खुंदेवं युववाणी म 'आज मोर पारी हे' कार्यक्रम दे खतिर। मन म विश्वास जागिस ताहन रम गेवं इही रद्दा म। आज आकाशवाणी म वार्ता, कहिनी, कविता के दौर चलते हे संग म 2008 ले सरलग रायपुर दूरदर्शन के भुंइया के गोठ कार्यक्रम के संचालन करत हवं।
अब प्रकाशन के बात करवं तव दैनिक अखबार हरिभूमि के चौपाल म मोर पहिली कविता 'दिन देवारी हे' छपिस। ओकर बाद बरछाबारी, देशबंधु, अमृत संदेश, प्रखर समाचार, इतवारी, छत्तीसगढ़, किसान वीर, पत्रिका सहित अऊ गजब अकन पत्र-पत्रिका म सरलग लेखन अउ प्रकाशन चलते हे संग म आकशवाणी, दूरदर्शन अउ रंगमंच कोती घलो रमे हाबवं।
माता-पिता अउ परिवार के साहमत ले आज अपन नानकुन साहित्यिक जीवन के कुछ रंग ल कहिनी के रुप म उतार पाय हवं। जेमा के तेरह ठन कहिनी ल 'परसार के गउंदन' किताब म समोखे हवं। आसा हे पढ़ईया मन के मन आही। साहित्य के रद्दा धरइया चंद्रशेखर चकोर, लोक कला के रंग म रंगइया राकेश तिवारी, अऊ ये रद्दा म डटे रेहे के बल देवइया सबो सुजानी सियान मन के पॉलगी करत ये कहिनी सिलोह परोसत हवं। बने लागही त अऊ बने-बने लिखे के मोला आसिस दिहव।

 - जयंत साहू
युवा साहित्यकार / पत्रकार
स्थायी पता—
 ग्राम- डूण्डा वार्ड-52, पोस्ट सेजबहार;
 ​जिला रायपुर छत्तीसगढ़
फोन-9826753304
jayantsahu9@gmail.com


आइये पढ़े क्रमश: सर्वश्रेष्ठ 13 छत्तीसगढ़ी कहानियों को—


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सइताहा

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग तेरह - सइताहा


गांव म काकरो घर चिटठी अवइ साहज बात नोहे, वहु म सरकारी चिटठी। काकरो घर म आथे तव गांव भर म सोर उड़ जथे। काबर अइस, काकर बर अइस गांव-गांव जान डारथे। फेर मंगतू गउटिया घर के चिटठी के सोर नइ उड़े। ऊंकर घर तो महीना पंदराही म चिटठी आतेच रिथे। चिटठी झोकत-झोकत ओकर उम्मर पोहावथे। गांव म कोनो पढ़े-लिखे ल नइ जानत रिहिस ते बखत ले ओकर घर म चिटठी आवत हे। अब तो वोकर नानकुन टूरा रतनू ह चिटठी पढ़ डरथे।
पोस्टमेन ह सइकिल के ठिनठिनी बजावत अइस अउ ठउका मंगतूच के दुवारी म सइकिल टेकाइस। मंगतू ह मुहाटी म चोंगी पियत बइठे रिहिस। अपन ह चिटठी ल नइ झोकिस रतनू ल किथे- जात रे रतनू पेरन्हा खार के पेसी के चिटठी ल झोक। डोकरा ह पढ़े-लिखे नइहे फेर चिटठी के रंग ल देख के जान डारथे पेसी के हरे किके। रतनू ह चिटठी ल झोकिस। उदास मन ले काहत हे अऊ कतका दिन ले पेरही ये पेरन्हा खार के पेसी ह। मंगतू ह भले आधा उमर के होगे फेर ओकर मन म गजब बिस्वास भरे हे। रतनू ल समझावत किथे- हमर जियत भर लड़बो थाना कछेरी ल ये हर हमर पुरखा के चिन्हा ये।
मंगतू ह अपन आगू के दिन ला सोरियावत हे। सौ अक्कड़ के जोतनदार मंगतू गउटिया काहत लागय। नाव हे मंगतू फेर ओकर दान धरम ल गांव-गांव जानथे। मंगतू के दुवारी ले कोनो दुच्छा नइ लहुटत रिहिस। गजब खेती-खार अउ रुपिया पइसा वाला रिहिस। आदत बेवहार म देवता बरोबर माने गांव वाला मन। ओकर पुछे बिना गांव म एक ठन पाना नइ डोलत रिहिस। मेला-मड़ई होवे चाहे रमायन किरतन। मंगतू गौटिया अगरबत्ती बार के सुरु करय। जम्मो परमुख काम म अगवा बरोबर ठाड़हे राहय।
हांसी खुसी ले सबो काम ल सीध पार के घर जाय ताहन वोकर मन उदास होजय। दुवारी म चड़ते साथ गउटनीन के उतरे थोथना। मंगतू ह कुछू केहे नइ पाय रिहिस गउटनीन के सुरु-दिन भर तोला घर-दुवार के संसो नइ राहय। बेरा उतरथे त घर डहर लोरहकथस। तोर अइसने करनी के सेती हमर खेती-खार बिगड़तहे। एका झन लइका ल कोरा म ओधा लेतेन ते हमरो डिह-डोंगरी म दीया बारतिस। मरत खानी एक मुठा पानी देतिस। येहा गउटनीन के रोज के बोली आए। बपरा मंगतू हा कलेचुप सुनय अउ गउटनिन ह अपन मन के बोझा ल हरु करय। बीस बछर होगे रिहिस तभो ले ओकर कोरा ह हरु गरु नइ होइस।
दिनो-दिन गउटनीन ल घुना खात रिहिस। तब मंगतू गउटिया ह अपन कका के टूरा परेम ल अपन कोरा म ओधा लिस। परेम ह अपन बाप कर बाटा म एक ठन टेपरी ल पाय रिहिस। बाड़हे परवार म एक ठन टेपरी के धान कतेक दिन ले पुरही। राहत ले खावय ताहन खंगे त बाड़ही मांग के गुजारा करय। साल के साल बाड़ही मंगई म ओकर उपर करजा लदाय राहय। मंगतू ल परेम उपर दया आगे अउ गउटनीन ह घला परेम ल चाहे।
परेम ह गजब कमइया घला रिहिस। गउटनीन के केहे म परेम ह अपन लोग लइका सुद्धा गउटिया घर आगे। 
 गउटिया ह अपन धरम-करम के काम करय अउ परेम वोकर खेती-खार के सरेखा करय। मंगतू के दया-धरम हा भगवान के आंखी म दिखत रिहिस। परेम के गौटिया घर अवई हा फलित होगे।
चार महीना के बिते ले गउटनिन के पांव भारी होगे। दूनो परानी ल गजब खुशी हागे। ऊकर म बाबू अइस तव मानो दुनिया के जम्मो सुख वोकर आगू म आगे। लइका के लालन-पालन म दूनो परानी ह जम्मो बेरा ल पोहा दए। सबो खेती खार के देख-रेख ल परेम ह करय।
एक दिन उदुप ले परेम ह गउटिया के घर ल छोड़ के पटइल बाड़ा म रेहे ल चल दिस। वोकर मन के बात उही जाने मंगतू गजब पुछिस फेर परेम ह एक भाखा नइ बकरिस। पटइल के टूरा ह साहर म वकील हे अउ सबे परवार सुद्धा साहर म रइथे। पटइल ह एक दिन गांव आइस त गांव वाला मन ओकरे मुंह के सुनिस कि परेम ह बाड़ा ल बिसा डरे हाबे।
गउटिया-गउटनिन के बियाए लइका ह बाड़ही तब मोला धुतकार दिही कइके परेम ह धोखा ले आधा जमीन ल अपन नाव करा डरे रिहिस। परेम ह मंगतू बर मने-मन गजब कपट करके ओकर गोद बेटा बनके जमीन ल वकील करा बेच डरे रिहिस। सइताहा परेम ह खाए पतरी म छेदा करही कइके मंगतू ह का जानय।
जानबा होइस त मंगतू अउ परेम म गजब झगरा झांसी होइस। गांव म बइठका सकलाइस। गांव के बइठका म परेम ह अपन गलती ल कबुलिस। उकील के भपकी म करनी करे हवं किके बकरिस। परेम ह अइसन गुनहगरा होही किके मंगतू का जानय।
गांव वाला मन घला नइ सोचे रिहिस कि परेम अइसन करनी करही किके। जेन ह आसरा दिस, करजा बोड़ी ले उबारिस उही ल दगा देदिस। परेम के करनी कबुले ले का होही। गांव के बात गांव नइ रिहिस। कोट कछेरी म आगे रिहिस। मंगतू ह घला कछेरी म दरखस दिस। पेसी ऊपर पेसी बाड़त गिस।
बाप पुरखा थाना-कछेरी देखे नइ रिहिस तेन ह आज अपन पुरखा के चिनहा ल बचाय बर जी परान ल दे के भीड़े हे। पेसी के चक्कर म मंगतू के कोठी अटगे। धनहा डोली ह परिया परगे। वो खेत ल न वकील बो सकत हे न मंगतू अऊ परेम तो वो खार ले दू कोस दूरिहा रेगथे। गांव म परेम बर अब काकरो करा मीठ बोली नइये। कोनो वोला एक पइसा के नइ पतियावतहे। बनि भुती बर लुलवावथे। जेने पावथे तेने धुतकार के काम देवथे। परेम ह जेन वकील के भपकी म करनी करे रिहिस तेनो ह अपन बाड़ा ले निकाल बाहिर कर दिस।
मंगतू ह मुड़ी धरे बइठे हे। खेत के आखरी सुनई हे अउ घर म चार आना पइसा नइये। गांव म खेती के जमीन ल खेती के पाछू बिगाड़ डरे हे। घर भर बाचें हे कइके मंगतू मने-मन सोचत हे। खेत के आखरी पेसी बर रूपिया के जुगाड़ म लगे हे मंगतू हा। वकील संग मानमनौता हो के खेत ल पा लिही। फेर बदली म वकील ह गजब अकन रुपिया मांगत हे। रतिहा कुन मंगतू मने-मन इही गुनथे कि बिहनिया घर ल गिरवी धरबो। अउ गुनत-गुनत आंखी ल मुंदे खटिया म डलगे हे।
थोरके म बादर लदलदा गे। गरज घुमर के पानी बरसे लगगे। मंगतू गउटिया कर तो घाम पानी ले बांचे बर घर हाबे। फेर परेम करा घर दुवार कांही नइ बाचिस।
बरसत पानी म एकर छानी ओकर छानी लुकावत हे। रदरदउवन पानी म पेरम ह गउटिया के पिछोत म लुकाय हे। बिकराल पानी म गांव चोरो बोरो होगे, भाड़ी अउ देवाल मन ओदरत हे। आधा रात के बिजली म पानी परेम ह अपन लोग लइका ल पोटारे दिवाल तिर ओधे हे।
थोरकेच म बादर गरजिस अउ बाड़ा के एक डहर के देवाल ह भकरस ले ओदारगे। धनतो परेम डहर के देवाल नइ गिरस नइते माई-पिल्ला जात रितिस।
बिजली के अंजोर म देवाल डहर ल परेम देखिस त नानकुन बटलोही गिरे राहय। बटलोही के भीतर म गजब अकन मोहर मन जुगूर-जुगूर चमकत रिहिस। पानी के धार म मोहर मन ऐती ओती ढुलत रिहिस।
परेम ह देखते साठ जान डरिस कि गउटिया के ददा ह देवाल म दबाय रिहिस होही तेने मोहर मन ह आज देवाल संग गिरगे। रात के अंधयारी म परेम के छोड़ कोनो अउ नइ देखिस। उपर ले गजब पानी घलो गिरत रिहिस। मंगतू गउटिया अउ रतनू मन ह पानी गिरथे किके ओदरे देवाल ल देखे बर नइ उठिस।
परेम एक मन म सोचे ए मोहर ल धर के अपन दरिदरी ल दूरिहा लव का। फेर दूसर मन म सोचे कि ए ह तो गउटिया के मोहर आए। एक बेर गउटिया संग दोगलइ करे हवं तेकर सजा मैं अभी भोगते हवं। अउ अब कहू मैं सइता के मारे ये मोहर ल गटकहंू त कोन जनी आगू अऊ का दुख के दिन देखे ल परही। इही सोच के मन म सइता बांधे रात भर पानी गिरत म मोहर ल सकेलिस अउ बटलोही म भर के राखे रिहिस। बिहनिया पानी छोड़िस। गउटिया जागिस त देखिस अपन गिरे देवाल ल। ओला थोरको गम नइ रिहिस कि देवाल म मोहर गड़े रिहिस होही किके।
 परेम के मन के मईल हा रतिहा के पानी म धोवागे रिहिस। छानी कस ओरछा आंखी ले पछतावा के बुंदा टपकत रिहिस। मंगतू के पांव म गिर के रात के बात बतइस अउ बटलोही भर मोहर लउटाइस। परेम ह छिमा-छिमा काहत रोवत रिहिस। मंगतू ह परेम के सफा मन ल देख के छिमा कर दिस।
अब मंगतू अउ परेम ह मिंझरके खेत के पेसी लड़िस अउ जीत घला गे। परेम के करनी ल लइकुसहा उमर के गलती जानके मंगतू अउ गउटनीन भुला दिस अऊ फेर अपन कोरा म ओधा लिस। मंगतू के अब एक नही दू बेटा होगे। गजब दिन ले परिया परे पेरनहा खार ह फेर परेम के मेहनत ले फेर हरियागे।
 ----------------------सिरागे --------------------------
लेखक - जयंत साहू 
पता- ग्राम डूण्डा, पोस्ट- सेजबहार
जिला/ तह. रायपुर छ.ग. 492015
मो. 9826753304
jayantsahu9@gamil.com

जंगल के पै

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग बारह - जंगल के पै


बस्तर के सांत अउ सुंदर बन म चिरई-चिरगुन के नरयई अउ नरवा ढोड़गी ले पानी के झमर-झमर बोहई मन ल मोह लेथे। अइसन मनमोहक बन म कोनो कोती ले बघवा गुरराथे त कोनो कोती कोलिहा गोहराथे। कोन जनी जंगलिहा मन इहा कइसे रई जथे, काबर की जंगल म मनखे ले जादा तो जीव जनावर भरे हे। जंगलिहा मन बर तो सेर भालू अउ सांप-बिच्छी साहज बात होगे। जिनगी के जम्मो जरवत के जिनिस इहे हे त बाहिर के दुनिया म जाके का करही।
कठियापाली म बीस घर के जंगलिहा मन के बस्ती बसे रिहिस। कुवां-बउली, सड़क, बिजली काही नइ रिहिस। पानी पसीया के निसतारी बर नरवा ढोड़गी। बेरा उवत मंगेस ह घर के दुवारी म बइठे अपन हंसिया टंगिया म धार लगावत रिहिस। ओकर टूरा बीराट ह सांझ कन बाहिर डहर गे रिहिस तेती ले बड़ेकजन भठेलिया धर के लाने हे। बीराट संग चार झन अउ धरन लागे हे ते पाए के एक ठन भठेलिया के चार भाग बनाय बर हे। मंगेस ह हंसिया टंगिया ल धोवत बीराट ल हांक पारिस। लान न रे रात कन के भठेलिया ल पउल देथवं। अतकी बड़ जीव ल चार झन धरेहव। मे होतेव ते एक्के झन दबोच डारतेवं।
बीराट किथे- तोर आंखी बरथे नही तेमा मुंधियार कन तको भठेलिया ल अकेल्ला धर डरतेस। मंगेस किथे- आंखी नइ बरे त का होगे आरो लेवत-लेवत पछलिग्गा दउड़े म फरक नइ खाय। चार हाथ के लउठी म दूहथ्था देबे ते एके बार म चितिया जथे। बाप बेटा बातिक-बाता होवत रिहिस। ओतके म बाटा वाला मन आगे। काहां हे बीराट रातिहा के भठेलिया ह। बीराट छोपी म ढांक के राखे रिहिस तेला उघार के देखावत किथे ये दे माड़े हे। चला न रे बाटबो। 
टूरा मन सकलागे अब एमन बांट लिही किके मंगेस ह टंगिया ल मड़ा के मुखारी करे बर पइठू कोती निकलगे। बीराट, समेन, मिसीर अउ जगेन चारो झन मिल बाट के पउलिस। बरोबर-बरोबर चार कुढ़हेना मड़ा के एकक भाग ल रपोटिस अउ अपन-अपन घर लेगिस। बीराट के दाई ह तो दिन म एके बेर भात रांधथे वहू ल मंझन के बेरा म। मंगेस ह बिहनिया बासी खवइया ये अउ बीराट ल तुरते ताजा भोजन होना तेकरे सेती ओकर दाई ह तीन परत पिचकाट नइ करवं किके एक्क_ा मंझनिया के रांधे टकराहा हे। उही भात ल संझा बिहनिया करके तीन परत पुरोथे।
मंगेस ह नहा-खोर के पइठू ले अइस। बटकी म भठेलिया तोपाय रिहिस तेला खपलके एक बटकी बासी अउ परसा पान के दोना म माटरा चटनी निकाल के दिस। चटनी पइस ताहन साग पुछे के जरुरते नइहे। जीब ल लमा-लाम के सपा-सप खइस अउ हाथ पोछत निकलगे। 
सांप बिच्छू अउ बघवा भालू के बीच म रइथे तभो ले जंगलिहा मन बड़ सीधा होथे। अब देख ना ओ दिन मंगेस ह जंगल ले अमली बीन के लानत रिहिस। उही समे एक झन सहरिया ह जंगल घुमे बर आए रिहिस। मंगेस के हाथ म अमली देख के सहरिया किथे- ए काये। मंगेस किथे- अमली ताय। सहरिया का पुछथे- लेके लानथस का? मंजेठ- नही ये हा तो हमर जंगल म अब्बड़ फरे हे गा।
सहरिया- अतेक अकन अमली ला का करथव। मंगेस- अमटाहा साग बनाय के काम आथे अउ लइका मन ह अमली के चिचोल ल निकाल के मिर्चा अउ नून म सऊंद के गोल-गोल लोइ बनाके ओमा काड़ी खुसेर के लाटा बनाथे। अमली के लाटा ल लइका का सियानो मन लार चुचवा-चुचवा के खाथे।
पाके-पाके अमली ल देख के सहरिया के मुंह म पानी आगे। मंगेस ल किथे ये अमली ल मोला देदे अउ के पइसा लेबे तेला बता। मंगेस ह मोटरी सुद्धा अमली ल सहरिया ल धारा दिस। का पइसा लेहूं साहेब ये तो हमर जंगलहिन दाई के बन म उपजे आसिस फर आए। जंगलहिन दाई ह हमर असन जंगल म रहवईया मन बर अपन कोरा म आमा, अमली, तेंदू, चार, काजू, बदाम, मउहा अउ बोइर, बहेरा ल उपजाय हे येला बेच के हम दंड के भागी नइ बनन। साहर म मांहगी म बेचावत जिनिस ल फोकट म पाके सहरिया ह गदगद होगे।
मंगेस ह घर अइस त ओकर गोसइन बासन ह किथे आज कइसे दुच्छा के दुच्छा के घर आगेव हो। अतेक बिकराल बन म तोला एक ठन काहीं नइ मिलिस। मंगेस किथे एक मोटरी अमली पाय रेहेवं, रद्दा म एक झन सहरिया मिलगे मांगिस ताहन उही ल दे देवं। बासन किथे अइसने कोनो-कोनो ल तै बाटते रिबे त कतेक दिन ले पुरही। बाल्टी-बाल्टी हेरई म कुवां के पानी घलो अटा जथे। अइसन जिनिस ल गली-गली गवांय के नोहय सरेखा करके राखे के आय थोकिन यहू कोती धियान ल राखे करा। मंगेस किथे ले भई अब कोनो ल नइ बाटवं तोर मन ले मनखुसी, कांदा रांधस चाहे खोक्सी नइ खाय ते लांघन राहय, खवईया होवे आधा सीसी। जा बासी लान अउ भठेलिया ल भुंज डारे होबे ते दे एको फर। मंगेस ह तुमड़ी ल मियार म अरो के टंगिया ल परवा म खोचिस। डारा-पतेरा के घर दुवार म कतेक ल बाहरत बटोरत रही पाना-पतई उड़ाय रिहिस तेने मे लसरंग ले बईठगे। बासन ह भीतर गिस बटकी भर बासी म नून अउ गोंदली डार के लानिस अउ मंगेस के आगू मड़ावत किथे भठेलिया ल चितवा लेगे खाय बर हे त इही ल खावा।
मंगेस किथे ले काहीं नइ होय काखरो होय पेटेच म तो गिस। अउ टूरा बीराट काहा गेहे दिखत नइ हे। बीराट ह तोरे कस दाउ दानीराम थोरे हे वो ह भठेलिया खाय हे ते चिलवा ल खोजे बर गे हावय। ते हमर बांटा के मास ल खाय हस त हम तोर मास ल खाबो किके सिमेन, मिसीर अउ जगेन मन घलो ओकेर संग लेंझकी डोंगरी कोती गे हावय। जंगलिहा मन संग तो रोजे सेर, भालू अउ चितवा के ओरभेट्टा होवत रिथे इही पाय के मंगेस ह लइका मन के जादा फिकर नइ लागिस। गे होही सोर लेवत कोनो डहर पाही तभो अउ नइ पाही तभो आबे तो करही किके अराम करे बर खटिया म ढलंगे।
धीरे-धीरे बेरा बुड़त गिस अउ कुलुप अंधियार होगे। दाई-ददा ल लइका मन के संसो परगे। लइकुसहा लइका अपर ले जीव जनावर ले भरे जंगल कोनो होय खबराबेच करही। अभी आही तमही आही कइके देखते-देखत आधा रात पोहागे। दूनो परानी के आंखी म निंद नइहे। जइसे-जइसे रात के अंधियारी गढ़हावत गिस मन म आनी-बानी के सपना सतावत गिस। जवान लइका ल गवांय के डर म रात भर आंखी ले आंसू डरत रिहिस। 
होत बिहनिया गांव के गुड़ी म मुनादी होइस। सुनव सुजान देके धियान हो... गांव के चार झन लइका ह काल रात कुन के लेंझकी डोंगरी ले लहुटे नइ हे हो....। जेन कोनो ह कहू कोती आरो पाहू त गांव म आके तुरते इतला दीहा हो....। 
लइका मन ल खोजत-खोजत अठोरिया ले पंदराही बीत गे। काही सोर पता नइ चलिस। गांव के कुआं बउली, खेत-खार अउ नरवा ढोड़गी म उहीच गोठ कहा होही कइसे होही अऊ जियत होही धन कहू सेर भालू खा डरे होही। उकर मन के डर ह वाजिब आए काबर की जंगल के कारोबर।
अब तो धीरे-धीरे मंगेस घलो अपन टूरा ल पाय के आस छोड़ दिस। देबी-देवता कर दूनो परानी ह अपन बेटा के दुख कलेस ल हरे के बिनती करिस। पीपर के पेड़ म मनौती के डोरी लपेट के गुर अउ मंदरस चड़ाइस। पानी रुको के दू गड़ी हुम धूप डार के पालगी करिस। हे जंगलहिन दाई मोर बीराट ह कोनो करा रहय फेर तोर कोरा ले झन दुरिहाय। हे अन्नपुर्ण दाई लइका के पेट कभु लांघन झन राहय ओकर मुंह म अब तही ह चारा चरावत रिबे। हे जलदेवकी मोर बीराट के तन ल तारत रइबे। 
रोज के घंटा पाहर देबी-देवता के मान मनौती अउ पूजा पाठ म बासन अउ मंगेस के मन लगे राहय। अइसने देखते-देखत बारा बछर बीतगे। नानकुन कठियापाली बस्ती ह चार सौ घर के गांव बनगे रिहिस। अब लोगन मन के पिये के पानी बर कुआं बोरिंग खोदा गे हवय। गांव के लइका मन के पढ़े बर इसकूल खुलगे रिहिस। घर के जरवत के समान बिसाय बर अब गांव म सुकरार के बजार लगथे। तीर तखार के छोटे-छोटे मंजरा टोला के मन कठियापाली बजार म अपन आमा, अमली, तेदू, चार अउ गजब अकन जंगल ले बीने फल-फलहरी ल बेचे बर आवे। साहर के बयपारी मन कठियापाली बजार ले कम किमत म बिसा के लेगय अउ अपन कोती जादा दाम बेचे।
तिहार के आगु साहर के नंगत झन बयपारी मन बजार आय रिहिस। सिजन म चार पइसा जादा कमइ होथे। किंजर-किंजर के समान ल बिसावत रिहिन। ओतके बेरा आठ दस झन मनखे मन मुंह म नेकाब लगाय अइस। ककरो हाथ म नानकुन बंदूक त काकरो हाथ बाड़का बंदूक रिहिस। एके रंग के कुर्ता पेंट पहिरे बजार के चारो मुड़ा बगरगे। बयपारी मन ल चिन-चिन के मार-मार के ढनगा दिस। 
कोलबिल-कोलबिल कावं-कावं के बजार ह चार झन बयपारी के मरे ले सन्नाटा पसरगे। कावंर बिता कावंर बोहे-बोहे भागे। मछर बिता टोकनी ल छोड़के भागे। येती ओती चारो कोती भागम भाग माते रिहिस। नेकाब वाला एक झन ह गोहार पार के किहिस तुमन ल डर्राय के जरवत नइ हे। हमन तुहर अउ ए जंगल के रक्छा खातिर ये रुप धरे हन। आज के बाद कोनो बाहिर वाला मन हमर जंगल भीतर के जिनिस ल बाहिर म बगराही त उकर लास अइसने बजार-बजार म परे मिलही। सबे झन नेकाब वाला मन बजार म चि_ी छोड़ के दोरदीर-दोरदीर जंगल भितरी समागे। उखर जाए के पाछू थाना ले सिपाही अइस अउ चारो झन बयपारी मन के बारे म पुछताछ होइस। कोन मारिस काबर मारिस। काहा ले अइस काहा गिस। बजार के मन काही ल जानबे नइ करे त काला बताही। सिपाही मन लास ल गाड़ी म भरके लेगे। ऐती बर सबे नकाब वाला मन अपन ठउर म पहुंचके ओरी-ओरी खड़ा होगे। इसकूल के परथना के बेरा खड़ा होथे तइसने। उकर दल के मुखिया ह सबके गिनती करिस। कोनो ह भागे उक तो नइ हे किके।

गिनती बरोबर म रिहिस त सबे झन अपन-अपन मुंह के कपड़ा खोलत गिन। एक डहर के लाइन म चार झन उही गांव के गवाए लइका बीराट, सिमेन, मिसीर अउ जगेन रिहिस घलो खड़े रिहिस। सौ अक झन रिहिस होही तेमा के आधा मनखे मन बीस बरस के जवान रिहिस अउ पहिली बेर कोनो मनखे ल मार के आय रिहिस। बंदूक ल ओतका बेरा चलाय बर तो चला डरिस फेर अभी ले उखर हाथ कापंथे। बीराट गजब दिन बाद अपन मन बात बोले के बल करिस।
बीराट किथे- अब हमन ला अपन घर जावन दो ददा हो। आज ले बारा साल पाछु चितवा ल कूदावत-कूदावत जंगल के ये लेंझकी डोंगरी म ओइले रेहेन। हमला चितवा तो नइ मिलिस फेर तुमन धर के राख लेव। मार पीट के डरा धमका के तीर कमान चलइया ल बंदूक धरा देव। नानमुन चुरी के बदला हमर हाथ बड़े-बड़े कटारी अउ फरसा धरा देव। अब हम अपने हाथ ले ए जंगलहिन दाई के अछरा ल लहू-लहू म लाल करथन। हमर से ये का का करम करवत हव। अपन हाथ म बंदूक उठाय ऊंकर मुखिया किथे- अब इहा ले कोनो वापिस जाय के झन सोचव। मैं तुहर दुसमन नोहवं महूं तुहरे असन ए जंगल के बेटा अवं भाई। अपन जंगलहिन दाई के रक्छा खतिर ये रुप धरे हवं। 
बीराट किथे- ए जंगलहिन दाई बलि तो नई मांगे। मुखिया- बीराट ए जंगलहिन दाई बलि नइ मांगे। लेकिन ए जंगलहिन दाई खुदे बलि के बेदी म झन चड़ जाए एकर सेती हमला बलिदान देना हे। अपन भोलापन के बलिदान देना हे, अपन सिधापन के बलिदान देना हे। ए जंगल ले बाहिर झांक के तो देख बीराट सुवारथ के दुनिया म तोर जिना दुबर हो जही। अफसर साही अउ नेतागिरी के जाहर पुरा हवा म बगर गे हवय। मुखिया अउ बीराट के गोठ बात होते रिहिस तभे कठियापाली गांव के खभरी अइस। उहा के बजार म आए लोगन मन ल सिपाही मन धर के थाना लेगे हे। रात भर थाना म बइठार के राखे हे। मार पीट के पुछताछ करत हावय। अतका बात ल सुन के मुखिया के मन के आगी अऊ गुंगवागे। तुरते सबला बला के आदेस करिस जाव थाना के सिपाही मन बता दव। हम बिगर करनी के काकरो काल नइ बनन। जेन हमर जंगल के पै उघारही, जंगलिहा के बिनास चाहही ओकर इही दसा होही। बीराट घलो अपन गांव के लोगन मन ल बचाय बर थाना कोती दउड़ परथे। थाना के एकठन खोली म गांव के सबे सुजानी सियान मन संग ओकर ददा मंगेस घलो ओइले हे। 
थाना आके सिपाही मन कोती बंदूक तान देथे। एला देखके सिपाही मन गोली दागे के सुरु कर दिस। दूनो डहर ले ठाए-ठाए बंदूक चलिस। दूनो कोती के कतको मनखे घायल होगे कतको के परान निकलगे। तभो ले आखिर तक लड़ई चलते रिहिस। खोली म धंधाय गांव के मनखे मन ये जीवन मरन के तमासा ल यमराज बरोबर अपन आंखी ले देखत राहय। अंधाधुंध मार काट ले थाना के सिपाही मन ल ढलगाए के बाद सबे झन नकाब वाला मन गांव वाला ल छोड़ाइस। लड़ई म मुर्छा साथी ल उठा-उठा के लेगत गिस अउ मुर्दा म कपड़ा ढांक पांच मुठा माटी डार के फेर अपन जंगल म समागे। 
गांव वाला मन कोन ल बने काहय कोन ल गिनहा। मनखे ल मनखे मार गिराइस इही भर तो देख पइस सियनहा। चार ठन मुर्दा देह उही मेर परे रिहिस। मंगेस ह दम करके तिर म गिस अउ मुंह म ढकाय कपड़ा ल उघार के देखिस। गांव ले निकले चारो लइका के भुलाय दिन के सुरता ह फेर बकबक ले आंखी म छपगे। कलहर के रो डरिस। बात ल कोनो परतित नइ करही किके कोनो ल नइ बतइस। बीराट अउ ओकर तीनो संगवारी के देह म फेर कपड़ा ओढ़ा के किरिया करम करा दिस। कठियापाली ले उपजिस सवाल ऊपर सवाल। ये का होइस? कइसे होइस? फेर ए जगल के पै ल कोनो नइ जान पइस। बारा साल ले टूटे आस के डोरी जुरे के पहिली जरके खपगे। कोनजनी ओ चारो लइका जियत रितिस त अऊ कतका पै उघरे रइतिस। सियनहा ह कोनो कहिनी सिरजन करइया के किताब के पाना ल आधा लिख के छोड़े बरोबर छोड़ दिस। काबर कि पै के खुदी उकेरबे त घेरी-बेरी हमरे जंगलहिन दाई के कोरा ह लाल होही अउ कोख ले फेर बैर बांधे पूत पैदा हो जही। जिही मेर के आगी तिही मेर जुड़ा जए तउने ह बने। 
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लेखक - जयंत साहू 
पता- ग्राम डूण्डा, पोस्ट- सेजबहार
जिला/ तह. रायपुर छ.ग. 492015 
मो. 9826753304
jayantsahu9@gmail.com

ईनाम

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग ग्यारह - ईनाम


जाड़ के दिन म स्कूल जाय बर लइका मन ल गजब मनाय बर लागथे। बिहनिया ले जागय नहीं। जाग जही त नहाय नहीं अउ नहा लिही त पइसा धरे बिना टरय नही। एकरे सेती तो कुंती ह किसन ल रोजे ठठाथे। मनायेक ल मनाथे घलो नइच मानही त नंगत दोहनथे। दाई-ददा ह नइ पढ़े हन त का हागे फेर लइका ल पढ़ाबो किके गजब साध मरथे। हजार नखरा करही तबले मनाके स्कूल पठोथे। किसन के रोज के इही रोना राहे।
कुंती ह बिहनिया सबले आगू उठ के चुल्हा ल लिपही तेकर पाछु पानी भरही। तेकर पाछु किसन अउ ओकर ददा ल उठाथे। उठते साठ दूनों झन ल चाहा होना। किसन ह दाई चाहा देना काहते काहत उटथे। कुंती किथे मैं तोर बर चाहा लावथव ते जा के मुंह आंखी धो के आ जा। किसन बिना मुंह आंखी धोय चाहा म दतगे। ओकर ददा किथेे ले काही नइ होय देदे। पी के धो लिही लइका जात ताए। कुंती किथे अइसने किके लइका ल मुड़ी म चघाय हस। देखबे अब नहाय बर कतका नखरा लगाही तेला।
सहिच म ए लइका बड़ घेक्खर हे। हव कही त हव नहीं त नहीच हे। किथे न अप्पत के देखे देवता हारे तइसने बरोबर कुंती ह किसन ले हार जथे। स्कूल के बेरा होगे किके सबे काम ल छोड़ के आगू ओकरे तियारी करथे। नहवा-खोरा के कपड़ा लत्ता पहिरा के ओला स्कूल अमरा के आथे तेकर पाछु घर के अंगना दुवारी ल बाहरथे। कोठा-कुरिया के गोबर-चिखल ल हेरही।
कभू ओकर दाई पाके लेगे कभू ओर ददा ह सइकिल म चघा के लेगे। तिसरी कलास म आगे हवय तब ले अपन होके स्कूल जाय ल नइ धरिस। कभू-कभू तो दू बेर घलो अमराय ल परे। कुंती ल स्कूल म छोड़ के आय ताहन पाछू-पाछू टूरा घलो आ जाए।
गुरुजी ह धर बांध के राखे त चार घंटा बइठे। स्कूल के पढ़ई म तो किसन ह सबले कमजोर हे। गुरुजी ह पढ़ावे त ये टूरा ह गोठियाइ म मगन रहे। पढ़ई-लिखई म धियाने नइ धरे। कभू कागज ल चाबहि त कभू पिनसन खाही।
गुरुजी ह हाजरी ले बर सबे झन के नाम पुकारथे।
गनेस .. आय हवं सर। रमेस .. आय हवं सर। महेस .. आय हवं सर।
किसन .. सबो लइकामन किथे आय हे सर। गुरुजी किथे कस रे किसन कलास म बइठे हस अउ हाजरी नइ बोलस। किसन किथे मोर आना अउ ना आना एके बरोबर हे गुरुजी। ते लगा दे करना मोर हाजरी ल। गुरुजी किथे तोला कतको समझाले कुछू असर नइ होए। पहिली कक्षा म रेहे तभो अइसने, रेहे चौथी म आगेस तभो अइसने। अब्बड़ चुटूर-चुटूर मारथस, ठाढ़ हो अउ काली पढ़ाय रेहेव तेला सुना तो। किसन ह ठाढ़ होइस अउ मुड़ी ल गड़िया दिस। रोज चार डंडा मार खाथस तभो नइ सुधरस किके खिसीया के गुरुजी ह रुल ल उठइस। मार खाय बर किसन ह हाथ ल लमइस। गुरु जी किसन के ललियाए हाथ ल देख के किथे- ये कामा लागे हाबे रे।
किसन किथे लागे नइहे गुरुजी काली तिही ह ददा ल बताय रेहे होबे तोर टूरा ह पढ़े-लिखे नहीं किके। ओकरे सेती आज बिहनिया कून ददा सूटी म मारिस तेकरे रोल उपके हे। अतका ल सुन के गुरु जी ह रुल ल उबायच रइगे मारे के हिम्मत नइ करिस। किसन के मुड़ी म मया के हाथ रेगाइस अउ खुरसी म जाके के बइठगे। गुरुजी ह खुरसी म बइठे मने मन गुनंथे। ये लइका ल सोज रद्दा म लाय बर का उदीम करवं? सोचते-सोचत गुरुजी ह एक झन लइका के किताब के जील्द म लगे खिलाड़ी मन के फोटो ल देख डरिस। सचिन, सहवाग, सानिया, धोनी मोनी मनके अऊ अब्बड़ झन आनी-बानी खिलाड़ी मन के फोटो छपे रिहिस। ओ फोटो ल देख के गुरुजी के गुत्थी सुलझगे। किसन ल सोज रद्दा म लाय बर खेलकुद के आयोजन करे के योजना बनइस। गुरू जी ल विचारत देख के किसन किथे कइसे तोला सांप सुंग दिस का गुरूजी कलेचुप होगेस। मारे के मन हे त मार न तोर मार म मोर अक्कल अउ बल ह बाढ़थे। गुरुजी किथे बइठ जा बेटा अउ तोर बल बाढ़थे तेला सकेले रा स्कूल के खेलकूद म काम आही। खेलकूद के नाव ले सबो लइका खुस होगे।
दू घंटा पढ़ाय के बाद गुरुजी ह खेलकूद के जानकारी ब्लॉक आफिस म देना हे किके जलदी छुट्टी देके लइका मन ल घर भेज दिस। सबो लइका मन अपन-अपन घर चलदिस। फेर किसन ह घर जाय ल छोड़के स्कूल के मैदान म खेलत रिहिस। किसन ल देख के गुरुजी किथे काली जलदी आहू रे खेलकूद के तियारी कराहंू। खेले कूदे के बात सुन के किसन बड़ मगन होगे। 
दुसरइया दिन सबो लइका साते बजे स्कूल आगे। किसन घलो बिना काकरो अमराय खुदे स्कूल आगे। गुरुजी के आवत ले किसन ह खुदे खेल के डाढ़ खिच डरे रिहिस। गुरुजी अइस त प्राथना होइस। ओरी-ओरी सबे लइका कलास म जाके बइठत गिस। गुरुजी घलो कलास म गिस अउ खेल खेले बर लइका मन ल पुछथे। गनेस ते का खेल म रिबे रे? रमेस ते का खेल म रिबे? पारी-पारी सबो लइका ल पुछ के नाम ल लिख डरिस। फेर किसन ल नइ पुछिस। किसन किथे मोर नाम ल नइ लिखे हस गुरूजी। गुरुजी किथे ते चिंता मत कर बेटा मैं सबोच खेल म तोर नाम लिख देहवं।
छब्बीस जनवरी के चार दिन अगाहू स्कूल म पढ़ई ह कम अउ खेलई ह जादा होगे। इही चार दिन के स्कूल अवइ किसन ल बने लागिस। काबर के पढ़ई कम अउ खेलई-कुदई ह ओला जादा भावे। खेलकूद के दिन किसन ह सबे खेल म भाग लिस अउ सबे म ईनाम घला जीतिस। कबड्डी, खोखो म किसन के टीम प्रथम। दउढ़ अउ लंबी कूद म घला अउवल। गोला फेक, उंची कूद अउ टेटंगी दउड़ म दूसरा आए रिहिस। 
गुरुजी के आयोजन सफल होगे अउ सबे खेल होय के बाद ईनाम बाटे के बेरा आगे। छब्बीस जनवरी के दिन स्कूल म गांव भर के मनखे मन जुरयाय रिहिस। लइका मन राष्ट्रगीत गाए के बाद भारत माता के जय बोलइस अउ तिरंगा झंडा के सलामी लिस तेकर पाछु गांव के सरपंच ह झंडा फहरा के ओ दिन के कार्यक्रम ल सुरु करिस। कविता-भासन अउ गीत-नाटक होय के बाद आखिर म ईनाम बाटे के बेरा आइस। 
गुरुजी ह नाम पुकारे अउ सरपंच ह अपन हाथ ले ईनाम ल देवे। लइका मन ईनाम ल झोके त देखइया मन ताली पीटे। पहिली तो सांस्कृतिक कार्यक्रम के इनामी बटिस तेकर पाछू खेलकूद के पारी अइस। खेलकूद म किसन ह त सात बेर ले गीस ईनाम झोके बर गीस। ईनाम बाटे के बेरा म गुरुजी ह किसन ल सबासी देके किथे सिरतोन म किसन ते आज अपन बल अउ विवेक ल देखा देस। पढ़ई म भले पछवाय हस फेर खेलकूद म सबले अगवागेस। अइसने मन लगाके खेलबे त एक दिन ते जरुर अपन नाम रोसन करबे। खेल के सातो ईनाम ल तो तोला दे डरेवं अउ आठवा ईनाम मैं अपन आसिरवाद तोला देवथवं। बाकी लइका मन एकक दूदी ठन ईनाम पाय रिहिस फेर किसन ह सात ठन ईनाम पाय रिहिस अउ आठवा म गुरुजी के परम आसिस। 
ये ईनाम ला देख के ओकर दाई-ददा मन गजब खुस हो जथे। किसन के सबे दिन के गलती ल भुलाके ओकर दाई-ददा दूनो ह छाती म ओधा लेथे। ए ईनाम ह तो किसन के जिनगी के रद्दा बदल दिस। खेलकूद के दूसरइया दिन छुट्टी परिस अउ तिसरइया दिन किसन ह बिना काकरो बोले अपन मनके स्कूल जाए बर तइयार हो जथे। अब तो ओकर दाई-ददा के घलो किसन कोती ले निसफिकिर होगे।
जब ले किसन ह छब्बीस जनवरी के ईनाम पाहे तब ले खेलकूद म बने धियान देवथे। हर साल खेल म भाग ले के अच्छा खिलाड़ी बनगे। एक दिन ब्लॉक कबड्डी टीम कुरुद म किसन के चयन होगे ओकर बाद उहा ले धमतरी जिला के टीम म। जिला के टीम म घलो किसन ह अच्छा खेल के परदरसन करिस त ओला आलराउडर के खिताब घला मिलीस। 
अब तो किसन ह गांव के गदहा टूरा नइ रइगै कबड्डी के चेमपियन होगे हे। खेल म आगू बाड़हे के सपना ह ओला पढ़ई म घला हूसियार बना दिस। हाई स्कूल के पढ़ई करे बर कुरुद जाथे। कुरुद स्कूल डहर ले आज ओहा राजधानी के टीम म खेले बर रइपुर गे हाबय। अब वो दिन दूरिहा नइये जब किसन ह अपन देस बर खेलही। किसन के ये बदलाव ल देख के घरवाला अउ गुरुजी के संगे-संग गांव वाला मन घलो बड़ खुस हे।
किसन ल गांव के स्कूल छोड़े नौ साल होगे हे। फेर गांव के स्कूल म जब भी खेलकूद होथे सबे झन एक घाव किसन ल जरुर सोरियाथे। गुरुजी ह हर छब्बीस जनवरी के ईनाम बांटे के बेरा अपन भासन म घलो किसन के नाम जरुर लेथे। गुरुजी किथे अइसने उन्नीस सौ नब्बे के छब्बीस जनवरी के दिन मैं अपन हाथ ले किसन ल ईनाम बाटे रेहेवं। आज देख किसन ह कतका ईनाम अउ नाम पावथे। अब कोनो दाई-ददा ये झन सोचव कि मोर लइका ह गद्हा हे त उमर भर गद्हा रही। कोनो न कोनो रद्दा म वहू ह अपन नाव रोसन करही। ओला जरुरत हे रद्दा देखाय के अउ ओकर हौसला बड़ाय के। अतका ल सुन के सबो झन ताली बजाथे अउ कार्यक्रम के आखरी म सब झन परसाद पाके गुरुजी के विवेक के गुनगान करत अपन-अपन घर चल देथे।
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लेखक - जयंत साहू 
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सुख के दिन

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग दस - सुख के दिन

बरसत पानी म नांगर जोतइया। घपटे अंधयारी म दउरी फंदइया। कतको जड़काला परय जांगर नइ कापय। कमइया ल कोन माटी म गढ़े हे गढ़इया ह तेन ल उही जाने। सिरतोन म विधाता ह बनि करइया के तन अउ मन ल अलगेच बनाए हे तभे तो सुखमिन ह नारी परानी होके घर के नांगर ल थामहे हे। गांव के सब मरद मन के बरोबरी करत दिन भर म आधा अक्कड़ ल जोत डारथे। घर के सियानी के पागा बांधे सबे काम ल उरकावथे। सुखमिन ह जब ले सालिक घर आहे सुख ल जाने नही। सास के मुंह नइ देखे हे ससुर ह खटिया धरे हे। दू झन लइका ओकर कोरा म हे। ओकर घरवाला सालिक के पांच साल होगे कांहि आरो नइ मिलत हाबे।
गांव म सब बनि करे बर परदेस जाए तेमा सालिक घलो जाए। पइसा-कउड़ी के जरवत राहे त गांव म कोनो न कोनो आत-जात रहे तेकर करा पठो देवे। अपन ह साल के साल पइसा-कउड़ी कमा के, खेती-किसानी के दिन म एक_ा गांव आए अउ अपन किसानी बुता ल करे। खेती-किसानी के काम सिराय के बाद फेर परदेस म बनी करे बर निकल जाय। आन दरी तो लगते असाढ़ म आ जात रिहिस फेर पांच बच्छर होगे आए नइहे। गांव के मन एकक करके घर लहुंटगे फेर सालिक के सोर पता नइहे। सुखमिन ह पुछथे गांव के मन ल किथे ए भ_ा म नइहे, ओ भ_ा म होही। उहां पता करिस त किथे इहो नइहे।
सुखमिन ल संसो होगे काहां होही, कइसन हाल म होही। सोर पता ले बर कोनो डहर निकलतिस त घर म कोनो सियान नइहे। गांव के कोनो-कोनो मन ल पुछिस त किथे सालिक ह बम्बई के कारखाना म कमात होही। अब सुखमिन ह सालिक ल खोजे बर जाही त घर-दुवार ल कोन देखही। सुखमिन ह सालिक के आए के आस म घर के सियानी ल चलावथे। लोग लइका के पढ़ई, ससुर के दवई। नारी परानी होके सबे काम ल कर लेथे इही गजब बड़ बात हे। घर म सियान के नाम म ससुर भर हाबे तेनो ह उठन-बइठन नइ सके। बपरी सुखमिन ह घर के काम ल करके खेत जाथे। खेत ले आथे त ससुर के जतन पानी करथे। अपन मन के दरद ल मने म दोब लेथे। घर-दुवार ल छोड़ के अपन आदमी ल खोजे ल तो घलो नइ जा सके। सुरता करके रोज एक आंसू रो लेथे।
एक दिन संझउती बेरा सुखमिन ह खेत ले आवत रिहिस। वोतके बेरा चरबज्जी बस आए रिहिस। चार बजे के आखरी बस आए ते पाय के मनमाड़़े भीड़ रिथे। बस ठाड़ होइस अउ ओरी-ओरी सबे सवारी उतरिस। आखिर म एक झन बुड़वा असन मनखे ल कनडेकटर ह धर के उतारिस। ओला देख के बस तीर म गजब भीड़ जुरयागे। मइलाहा असन चद्दर ओड़हे ओ डोकरा ल गांव के मन धर के सड़क तीर के होटल म लेगिन।
 दिन बुड़गे रिहिस अंधियार मन मनखे नइ चिनहाइस। चिमनी ल लान के अंजोर म देखिस त सालिक आए। खांसी-खोखी अउ जर-बुखार म अकबकाय। कमजोरी म निच्चट धकधकागे रिहिस। आंखी-कान खुसर गे रिहिस। सालिक ल देख के सुखमिन ह गजब गमन होगे। ओकर बर तो मानो दुनिया के जम्मो सुख आगे। फेर ओकर सुख जादा बेरा ले नइ ठाहरिस।
पांच साल बाद पति मिलिस वहू म अधमरा। सालिक किथे मोला टीबी बिमारी धरे हे। पइसा कमाय के रोस म रोज के कारखाना के धुया ल पी पीके ये रोग ल लगाय हव। डाक्टर ह आजे काल के मेहमान अस केहे हे ते पाय के अपन जीनगी के आखरी दिन अपन गांव म कांटे बर आय हवं। सुखमिन किथे अतका ले दिन काहा रेहेव हो, हमन तोला गजब खोजेन। 
सालिक किथे- मेहा अपन बीमारी ल जान डरे रेहेवं अउ फेर इहा अतेव तोर उपर अउ बोझा होतेव। इही पाय के मैं घर-परिवार ले भागे-भागे फिरत रेहेवं। सुखमिन- किथे तुही मन तो मोर पति देवता आव। अपन आप ल बोझा काबर किथव। हमरे सुख बर तो परदेस बनि कमाय बर गे रेहेव। सुखमिन ह पांव परिस अउ धर के अपन घर लानिस। बिमरहा राहय चाहे कनवा-खोरवा पति ह पति होथे। सती अनसइया के धरती म सुखमिन जइसन नारी ह जनम धरे हे। कइसे बीमार पति ल छोड़ देतिस।
सालिक ल घर म बइठार के आरती उतारिस। बिहनिया ले गांव के पुरोहित करा गिस अउ बला के सतनरायन के कथा करा डरिस। सालिक ह घर लहुंट आ जए कइके सुखमिन ह गांव के देवधामी म बदना घलो बदे रिहिस। संझा कुन गांवे के दुकान म एक्कइस ठन नरियर लिस। अउ ओरी-ओरी सबो देबी-देवता मन म जाके चड़ाइस। सुखमिन अब मगन होगे अउ अपन दुख ल बिसराके घर परवार ल बने चलावथे। दूनो झन लइका ल पढ़ाथे। अपन ह भले पढ़े-लिखे नइहे फेर पढ़ई-लिखई के महत्ता ल जानथे। अबतो सुखमिन के एके सपना हे वोकर लइका मन पढ़-लिख के बने असन काम करके घर के आधा बोझा उठाए। इही सपना संजो के अपन पेट काट-काट के लइका ल पढ़ावथे। ससुर अउ पति के सेवा करके बहु अउ पत्नी के धरम ल घलो निभावथे।
गांव म खेती-किसानी अउ बनि-भुती के परसादे अपन जीवन ल चलावथे। अकेल्ला नारी परानी होके चरचर ठन जीव ल पोसथे। सुखमिन के इही बेवहार ल देखके गांव के मन ओकर साहमत बर आगू आ जथे। फेर सुखमिन काकरो सो रुपिया-पइसा के मदद नइ मांगिस। 
वोतो काहय मोला काम बुता देवव जेकर बनि ले मंै घर ल चलाहूं। मैं दया अउ भीख ले अपन लोग लइका ल नइ पोसवं। रुखा-सुखा दिन बितत गिस। लइका मन बाड़हत गिस। सुखमिन ल का पढ़ई के भूत धरे रिहिस ते लइका मन ल घड़ी-घड़ी पढ़हेच बर बरजय। लइका मन ल बेरा म तियार करके इसकूल पठोवे। कापी-किताब अउ इसकूल के सरी चीज ल आगू के आगू लान के मड़ावे। कोनो-कोनो किथे सुखमिन तोर टूरा मन ल घलो काम बुता म लानते नही, त सुखमिन किथे मोर खून पछीना संग भले मोर मास बेचा जए फेर मैं अपन लइका मन के पढ़ई छोड़ा के वोमन ल काम म नइ लागवं। लइका मन गजब मेहनती रिहिस। दाई ह बाहिर कमाय बर जाए राहे त अपन मन इसकूल ले आके घर के काम कर डरे। अपन बाप सालिक अउ बबा के जतन पानी घलो करे। बाकी बेरा म सिरीफ पढ़ई बुता ल करे।
वोकर सेवा भाव एक दिन भगवान के आंखी म दिखिस। लइका मन बने ढंग ले पढ़-लिख के हूसियार होगे। एक झन हा गांव के इसकूल म मास्टर होगे अउ दूसर ह अभी डाक्टरी पढ़त हाबे। अबतो सुखमिन बर सुख के दिन आगे। लइका ह ओकर मुड़ी के बोझा ल बोहे के लइक होगे। जेन सुख बर सुखमिन ह अपन लहू ल पेर के घर ल चलइस वो सुख ल पा लिस। बेटा मन अब वोला थोरको काम करन नइ देवे। एक बेर के पसिया म गुजारा करइया सुखमिन ह अब बेटा मन के परसादे घी के रोटी खाथे। दिन ह अब ससुर अउ पति के सेवा म बितथे। सुखमिन के दिन बहुरत देखके गांव वाला मन किथे गरीबी म घलो बेटा मन ला पढ़ाइस लिखाइस तेकर सेती सुखमिन ह आज सुख के दिन देखत हे।
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लेखक - जयंत साहू 
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मया अउ माया

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग नौ- मया अउ माया



गजब दिन बाद तरिया पार के बुढ़ादेव के मंदिर म मनमाड़े भीड़ जुरियाय हे। कोनो नरियर चड़ावथे कोनो फूल पान चड़ावथे। उहा के अगरबत्ती अउ हूम धूप ले तो सरी गांव ममहावे। मंदिर भितरी पिड़हा म पलतियाय एक झन साधू महारज बइठे हे, ओकरे दरस बर पूरा गांव उमड़ गे हावय। मंदिर के दुवारी के आत ले दरस करईया मन लमियागे हे। बाबू पिला मन के अलग अउ नोनी मन के अलग लाइन लगे हे। भीड़ ल देखे म अइसे लागथे जानो माने साकछात देवता ह मंदिर म बिराजमान होगे होही। ढकलिक-ढकला म बोजाय परत हे तभो ले एक नजर दरस के आस बर लोगन मन ह मंदिर म जुझे हे। 

दरस करइया मन एकक करके भीतर जात जाए अउ अपन-अपन भाग ल जान के बाहिर आत जाए। उही गांव के रहईया गनेस ह दरस करके अईस त बाहिर म खड़े रामू ह पुछथे कस जी ओ साधू आहे तेन ह का लेथे अउ काला देख के बताथे। गनेस किथे काहीच नइ लय ते जाबे ताहन तोर थोथना ल देखही अउ हवन जलाहे तेमा हूम ल डारही। ताहन तोर सबे ल फरिफरा बता दिही। साधू महराज ह रुपिया पइसा काही नइ मांगे तोर उचित के दान देवता म चड़ा देबे। अतका ल सुन के रामू घलो साधू के दरस करे के मन बनइस अउ लाइन म लगगे।

धीरे-धीरे लाइन सरकत-सरकत रामू के पारी आइस। साधू महराज ह रामू ल दू गड़ी हूम ल दिस आगी म छोड़ाइस कलस म बुड़े दुबी पान के आगी म ऑचमन करईस। साधू किथे तोर नाम रा अक्षर ले आथे। रामू किहिस हव महराज मोर रामू नाव हे। साधू किथे तोर बाई के नाम क अक्षर ले आथे। रामू- हव महराज मोर बाई के नाव कमला हे। साधू- तोर तीन बेटी अउ एक बेटा हे। रामू किथे हहो महराज।

साधू के सत बचन सून के रामू किथे- तेतो सबे ल जानथस साधू महराज मोर ददा के बारे म बताते। महराज ह आंखी मुंद के धियान लगइस अउ मने मन म मंतर बड़बड़ाइस। थोरकेच म आंखी उघारके किहिस तोर बाप गांव म कोतवाली करे अउ वोला बीते बीस बरस होगे हे। अतका ल सुन के रामू ह मन मगन होगे अउ सौ रुपिया के नोट ल निकाल के साधू धरावत रिहिस। 
साधू किथे- हम रुपिया पइसा नइ लेवन बेटा। तोला देच बर हे त ये रुपिया ल बुढ़ादेव के मंदिर म चड़ा दे। रामू सौ के एकठन अऊ नोट निकालिस अउ चड़ा दिस। रामू पुछिस कोन आव महराज काहां ले आय हवं। साधू किथे हम तो रमता जोगी आन जिहे ठहर गेन तिही ल हमर घर दुवार जान।

साधु महराज के गियान अउ महानता के सेती गांव वाला मन ओला अपने गांव अमलेसर म डेरा जमाय के बिनती करथे। साधू ह गांव वाला मन के बात मान के उही मंदिर म अपन धुनी रमा दिस। ओरी-ओरी गांव के सबे मनखे मन साधू के मुंह ले अपन भाग के आज अउ काल ल जान डरिस। बुढ़ादेव के मंदिर म धुनी रमाय साधू ह सबला हवन के आगी म हुम देवावे अउ भविष्य बतावे तेकर सेती गांव म ओहा हूमदेवा महराज के नाम परसिध होगे। दिनो दिन हूमदेवा महराज के सत ह बगरत गिस। लोगन मन अब अपन इच्छा ले चाउर दार रुपिया पइसा चढ़ावत राहय उही म महराज के गुुजारा चलय। 
अब तो तीर तखार के गांव वाला मन घलो हूमदेवा के दरस करे बर आए लगगे। जेकर जइसे इच्छा तइसे अपन उचित के दान बुढ़ादेव म चड़ावा चड़ा के हूमदेवा के असिस पा लय। देखते-देखत दूवे साल के दान म बुढ़ादेव के बड़ेजन मंदिर बनगे। मंदिर के तो रंग रुप बदल गे फेर साधू के आदत बेवहार थोरको नइ बदलिस। धन दौलत के माया मोह ओकर भीतर आबे नइ करिस। कोन जाने अउ का पाय के आस म हूमदेवा महराज धुनी रामाय हे। काकर आय के आस म ओकर आंखी ह चोबीसो घंटा जागत हे तेला उही जाने।

हसउद वाली सांति ह घलो एक दिन अमलेसर म आय हूमदेवा महराज के किस्सा सुनिस। सांति के सुखाय घाव फेर हरियागे। सांति ह जेन मन के पिरा ल भुलाय बर दस कोस दुरिहा हसउद आ बसे रिहिस उही पिरा ह आज फेर ओकर मन म लोटगे। घड़ी-घड़ी बेटा के सुध सताय लगिस। आखिर अपने मन ले हार के सांति ह अमलेसर जाय के सुध लमइस।
सांति ह अमलेसर के बिहाता बहू ये। जब उहा ले निकलिस त अपन देह ल मुर्दा जान के निकलिस ताहन फेर दूबारा उहा पावं नइ धरिस। गांव अवई-जवई तो दूरिहा अमलेसर के नाव सुन के कान ल मुंद लय। सांति ह चालिस साल बाद ओ गांव म जाय के मन करे हे उहू म अपन बेटा के खातिर। अमलेसर जाय बर तो सांति ह घर ले तो निकलगे फेर ओकर मन ह आजो उहा जाए ल नइ काहथे। मया ले हारे अउ मन ल मारे सांति ह नानकुन झोला म सेर चाउर धर के घर ले निकलगे। धीरे-धीरे रद्दा रेंगत अपन बिहा के दिन सुरता करथे।

आगू के दिन म बिहा के आगू नोनी-बाबू ल देखे के रित नइ रिहिस। दाई-ददा ह जेकर अछरा म बांध दिस, जीयत मरत ले ओकरे संग जोड़ी जुड़ जथे। सांति ह बड़ खुसी-खुसी हसउद ले बिहा के अमलेसर आय रिहिस। किथे बिहा के बाद बेटी के दूसरा जनम होथे। बाप के घर ले निकल के ससुर के अंगना म पांव धरथे। ये तो अपन-अपन भाग के कोन ह कइसन घर-संसार ल पाथे। नवा-नवा म तो काही पै नइ दिखिस फेर चारे महीना के बिते ले देरानी-जेठानी संग तारी नइ पटिस। रोज दिन लिखरी-लिखरी बात बर खिटिर-पिटिर होवत राहय।
गरीब घर के बेटी अपन जोरन म दाई-ददा के आसिस के छोड़े अउ कुछू नइ लाने रिहिस। सांति ह देरानी-जेठानी के गारी बखाना के बात ल सास ल बतावे त ओकर सास उलटा ओखरे बर बउरा जए। सांति के देरानी-जेठानी मन तो बड़े-बड़े घर ले गे रिहिस। अपन जोरन म हंडा भर-भर दाहिज धर के लाने रिहिस ते पाय के ससुर घलो उही मन ल भावे। बपरी गरीबिन अब काकर सो अपन दुख पीरा बिसरातिस।

सास-ससुर, देरानी-जेठानी ले भरे पूरे परवार रई के भी सांति ह अकेल्ला हो जए। सांति के घरवाला तो मंधवा। घर म का होवथे ओला काही के संसो नइ हे। सांति के तो एक नइ सुनय तभो ले बिचारी ह सबो के ताना सुनत ससुरार म जीव दे बइठे हे। सांति ल ओ मन कभू अपन घर के बहु नइ जानिस। जब देखबे तब नौकर बरोबर ओला हांकत रइथे। बिन मुंह के गाय बरोबर गेेरवा म बंधाय हे त बने हे कोनो दिन मुंह म कही की परथे त मंधवा के मार खावे। सांति ह कांही नइ काहय तभो ले चलवंतिन मन लड़े के ओखी खोजत रइथे। 
एक दिन रिस के मारे सांति ह अपन मइके चल दिस। दाई-ददा ह दिन भर मया ले गोठिया लिस। संझाकुन समझा बुझा के फेर ससुरार अमरा दिस। नारी जनम धरे हस त दुख भोगे ल परही। नारी देह के उपर मन के बस थोरहे चलही नइ चाह के भी सांति के पांव भारी होगे। अब तो कहू जा घलो नइ सके। हरु गरु हे ते पाय के नरक कस दुनिया म ओड़ा दताय हे। नौ महिना के बाद गरीबिन के कोख ले भागी के जनम होगे। इही ओढ़र म मोरो भाग सवरही किके सांति के मन म खुसी हमांगे। काबर की बेटा के मुह देखके तो बड़े-बड़े अधर्मी के धरम जाग जथे।

भागी बेटा के सेती सांति के भाग म विधाता ह चार साल के सुख लिखे रिहिस होही। तभे तो चार साल सास-ससुर, देरानी-जेठनी, काकरो ताना नइ सुनइस। भागी ह महतारी के दूध ल छोड़ के अब पसिया पेज खाय ल धर लिस। लइका मुंह म कॉवरा का गिस गरीबिन के भाग के सुख अटागे। सांति ह फेर बात-बात म दाहिज के ठोसरा खावे। रोज-रोज के ठोसरा म दाना-पानी हर ओकर अंग नइ लगिस अउ संसो के घुन म सुखा के सांति ह काड़ी होगे रिहिस।
 सास ससुर ल तो छोड़ पति ह घलो सांति के जतन-पानी बर जिकर नइ करिस। बिना दाहिज के आए रिहिस ते पाय के बपरी के गत बिगड़त हे। सांति ल बीमरहिन होगे किके मंधवा गोसइया ह अऊ नवा गोसइन बना लिस। डउका जात के का हे जांगर के चलत ले डउकी बनाही लोक लाज के डर तो नारी परानी ल हे। सांति के सउत तो सबले जादा चलचला हे बात-बात म कटकिट-कटकिट करथे। हड़िया के डर म कांपत सांति बर तो अऊ परई आगे। अब ये घर म मैं नइ खटाववं किके सांति अपन लइका ल धर के मइके म निकलगे। अपन गिस ते गिस लइका ल घलो लेगे किके सास ससुर ह पछलिग्गा ओकर मइके आगे। सांति ह भागी ल कोरा म लुकाय रिहिस तेला नंगा के लान लिस।

गांव म बइठका सकेल के सांति अउ मंधवा के छोड़ा-छाड़ी करा दिस। सांति ल अपन ससुरार के लड़ई-झगरा ले मुक्ती मिलगे फेर अपन भागी के सकला नइ कर सकिस। लइका ल पंचइत ह ओकर बाप के हिले लगा दिस। सांति ह लइका ल अपने तिर राखे गर गजब अरजी बिनती करिस। मोर लइका ल मोला देदे ... मोर लइका ल मोला देदव ... कलप-कलप के रोवत हे। तभो ले पंचइत ह लइका ल सांति ल नइ देवइस। 
सांति ह तुहर मुंह देखना तो छोड़ गांव म पांव तको नइ मड़ाव किके दुच्छा हाथ पंचइत ले घर लहूटगे। दूयेच साल के गे ले अचानक ओकर लइका भागी ह घर ले लापता होगे। गजब खोजिस फेर कोनो डहर सोर पता नइ मिलिस। कोनो घर ले खेदार दिस धन अपने ह घर ले निकल के कोनो डहर चलदिस ते काहि जानबा नइ होइस। सांति ह अपन कोत ले गजब खोजिस। जेने डहर जाय के आस मिलय तेने कोती दउड़ जए। सांति के भाग म भागी के मया लिखेच नइ रिहिस।

सगे बाप अउ मोसी दाई ह अपन लोग लइका के मया म ओ लइका ल भुलागे। फेर सांति ह अपन बियाय लइका ल कइसे भुलातिस। सांति ल लइका खोजत आधा उमर होगे फेर बपरी अभागिन ह आज ले अपन बेटा नइ पाय हे।
हूमदेवा महराज के नाव सुन के सांति के मन म फेर आस जागे हे। लइका नइ मिलही त ओकर सोर पता तो मिलही किके मने मन सोचत अमलेसर के सियार ल खुंदत हे। सांति ह जवानी म निकले रिहिस ते बुढ़ापा म लइका के खतिर फेर अमलेसर म पांव मड़ावत हे। पंदरा सौ के बस्ती ह अब पंदरा हजार आबादी के सहर बनगे रिहिस। कोनो चिनहार मनखे नइ दिखत रिहिस। सांति ह एकझन दुकान वाला ल पुछिस हूमदेवा महराज ह कते मेर हे ग। दुकान वाला किथे बुढ़ादेव मंदिर म रइथे वो। सांति ह बुढ़ादेव के मंदिर ल जवानी के दिन म देखे रिहिस। सुरता करत धुसुर-धुसुर मंदिर के लकठा म पहुचगे।

तरिया पार के नानकुन मंदिर के म जगा बड़ेकजन मंदिर बने रिहिस। हो न हो इही होही साधू के डेरा किके सांति ह भितरी म गिस। लाम-लाम मेछा डाढ़ही कनिहा के आत ले लटियारा चुंदी, धुनि रमाय आसन जमाय बइठे रिहिस। सांति ह जाके हवन के आगी म दू गड़ी हूम ल डारिस कलस के जल ले आचंमन करिस अउ बुढ़ादेव के आगु मुंडी नवइस। सांति के छईहा परते ही साधू महराज के आंखी टप ले उघरगे। सांति ल देखते ही आठो पाहर जागत ओकर आंखी म आंसू भरगे। साधू के आंखी अइसे सुकून भरे लिपकी परय जइसे ओकरे अगोरा म बरसो जागे होही। तन ल मन के बस म करत सुख भरे सांस लिस।  
साधू महराज अपन नजर भर सांति ल देखत किथे- तै अपन दूधमुहा लइका ल ससुरार म छोड़ के निकले हस दाई अउ आज ले मइके म बइठेहस। ते जेन लइका के खोज म आय हस ओहा तो कब के जोगी होगे हे। लइका के आरो देवा के साधू ह सांति के सुखाय मया ल उभरा दिस। सांति ह लइका के सुरता म सुसक ससुक के रो डरिस। सिरतोन काहथव महराज मैं अपन लइका के खोज म आए हवं। हूमदेवा के पांव म गिर के किथे मोला मोर लइका के पता बता दव महराज। मैं अपन लइका बिना न जीये सकत हवं अउ न मरे सकत हवं। एक नजर ओला देख लेतेवं त मोरो जीव जुड़ा जतिस।

साधू किथे मोर पांव ल झन धर दाइ तै तो मोर माता समान हस। तोर लइका ह तोरे सेती जोगी होहे। नानपन म तोर कोरा छूटगे। मोसी दाई ले मया के आस लगाये त वहू धुतकार दिस। मोसी दाई अपन बियाय लइका के दुलार म तोर भागी के भाग म दुख-पिरा लिख दिस। तोर लइका बर सबे के मया अटागे रिहिस। मोसी दाई के दू ठन आंखी होगे रिहिस। एक ठन आंखी म अपन बियाय बर अगाध मया राहय अउ दूसर आंखी ह तोर बेटा बर ललियाय राहय। एक ठन थारी म घीव के रोटी आमा के अथान। दूसर म सूक्खा रोटी अउ नून मिरचा के चटनी। रो-रो के दिन काटिस अभागा। जे दिन हद ले बाहिर होगे अतियाचार, भगागे लइका छोड़ के घर दुवार। बड़ भागमानी रिहिस लइका जोन पालिस साधू के संगत। सत संगत नइ मिलतिस त कोन जनी लइका के का गत होतिस। 
बेटा के हाल चाल सुनत सांति के आंसू टप- टप हूमदेवा महराज के हवन म गिरत रिहिस। बतावत-बतावत साधू के आंखी ले घलो आंसू के धार बोहाय लगगे। सांति किथे हूमदेवा महराज तूमन मोर भागी के नस-नस के खबर धरे हव। आज के बेरा म कोनो गियानी म अतका बल नइये जोन काकरो भीतर के पिरा ल भांप सके। तै तो घटना के अइसे बरन करे हस जइसे तोरे उपर बिते हे। हो न हो तिही ह मोर लइका आस किके सांति ह साधू ल पोटार लीस। महतारी के मया के आगू साधू के माया नइ चलिस।

सांति के छाती म ओधे-ओधे साधू किथे- हव दाई मिही तोर लइका भागी आवं। फेर मैं ह अब माया मोह छोड़ के बैरागी होगे हवं। मंै गांव के मन के परछो ले खातिर आय रेहेव। घर हाल चाल जाने बर आय रेहेव। फेर ये गांव के मन तो मोला अपन गांव के लइका नहीं हूमदेवा महराज के रुप म चिनहीस। दाई तै ह आज मोला अपन बेटा के रुप म चिन डरेस।
साधू ह सांति के पांव छू के किहिस माता मैं ह तो अब तोला बेटा के सुख न नइ दे सकवं। अब तहू ह ये बात ल इही मेर बिसर जा अउ लहूट ता अपन अंगना। महू ल जाना हे अपन ठिकाना। जेन कारज बर मैं इहा आय रेहेव ओ आज पूरा होगे। साधू महराज ह सांति के आंसू पोछिस अउ वोकर मुड़ी म हाथ रख के किहिस दाई आज ले ना मैं तोर बेटा अव अउ ना तै मोर महतारी। तै अपन दुनिया म लहुट जा। मैं अपन दुनिया म जाथवं। अतका कइके साधू ह आंखी मुंद के धियान म बइठगे। सांति ह घलो आंखी उघारिस अउ जय हूमदेेवा किके महराज के जय जयकार करत उही पांव अपन गांव लहुटगे। ओ दिन के बाद गांव के मंदिर म कोनो ह हूमदेवा महराज ल नइ देखिस। काहा गिस काबर गिस। जोगी के मन के बात जोगी जाने रे भाई।
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लेखक - जयंत साहू 
पता- ग्राम डूण्डा, पोस्ट- सेजबहार
जिला/ तह. रायपुर छ.ग. 492015 
मो. 9826753304
jayantsahu9@gmail.com

दुरपती

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग आठ- दुरपती


गांव के लीला चौरा म संझउती होइस ताहन गजब भीड़ जुरिया जथे। लइका मन तो दिन बुड़े के पहिलीच ले अपन-अपन बर जगह पोगरा डरथे। संझकेरहे जेवन करके घलो आ जथे। भीतर कोती सब कलाकार मन संभरथे अउ बाहिर म देखइया मन के भीड़ जुरियावथे। अब अगोरा हे त राम लीला सुरु होय के। 
लीला ल गांव के मनखे मन गंगा कस फरिहर अउ प्रयाग कस पावन मानथे। घरो घर ले आरती के थारी आथे। गांव के लीला चौरा म संउहत भगवान राम, लछमन, माता जानकी अउ बीर हनुमान बिराज मन होथे। मंगल आरती के संग सुरु होथे राम जी के लीला।
दुरपती ह रात कन के जेवन बना के अपन सहेली मन संग लीला देखे बर निकलथे। ददा ह खिसिया के किथे- घर के बुता काम छुट जए ते छुट जए फेर तोर लीला हर झन छुटे। दे मोला कावंरा खाय बर ताहन जाबे।
दुरपती किथे- दाई करा मांग ले न गा। लीला सुरु होगे हम जाथन हमर सहेली मन अगोरत होही। साल ल ओड़हिस, बोरा धरिस अउ निकलगे। सबो सहेली एके करा जुरिया के बइठथे।
लीला ल बड़ धियान से देखथे। लछमन के पाठ के बेरा तो दुरपती लिपकी घलो नइ मारे। ओकर सहेली मन ह गोठिवात रिथे तेन मन ल सांत करा देथे। सहेली मन दुरपती के परेम ले अनजान नइ रिहिस। सबो झन जाने येहा लीला म रमायन देखे बर नइ आवे। येतो लीला म लछमन के पाठ करथे ते राधे ल देखे बर आथे।
राधे अउ दुरपती म अगास परेम रिहिस। राधे ह अपन पाठ म बुड़े रिहिस त दुरपती ह राधे के परेम म बुड़े रिहिस। जभे लीला सिरातिस तभे दुरपती ह घर आतिस। अपन संग म अपन सेहली मन ल घलो बइठार के राखे राहय।
रात के लीला सिरावे ताहन बिहनिया राधे ह तरिया के पार म ओड़ा ल दे राहय। दुरपती ह थारी बरतन धोय बर आवे। राधे ह बइला-भइसा धोवत बइठे राहय। अपन-अपन काम म दूनो रमे हे फेर दूनो के नजर ह एक दूसर म लगे हे। नजर ले नजर जुड़े इसारा-इसारा म गोठ बात होय।
राधे अउ दुरपती के मया ह गांव भर म आगी बरोबर गुंगवागे। दूनो के घर म उकर मया के सोर उड़गे। एके जात सगा के रिहिस। दूनो डहर केसियान मन मिल बइठ के लइका मन के खुसी के खातिर बिहाव करे के फैसला करिस अउ फलदान ल तुरते मड़ा दिस।
गांव के सगा सोधर कतेक चोचला लगाही। वोकर चूलहा ल ए देखे, एकर चूलहा ल वो देखे। सगा मन अपन घर ले गोड़ धो के दुरपती घर आगे। सगा घर गोड़ धोय के जरुरते नइ हे। ए पारा ले ओ पारा जाय म कतेक धुररा उड़ही। फेर सगा घर गोड़ धोय के नेंग तो छुटे ल परही।
फलदान म कोनो बाहिर के सगा दिखबे नइ करे। राधे डहर ओकर लीला पालटी वाला अउ दुरपती कोती उकर घर के अउ दू चार झन सहेली भइगे। राम, लछमन, भरत, सतरोहन, रावन, मेंगनाथ, हनुमान, सीता, मंदोदरी, सुरपनक्खा, जोक्कड़ अउ संग म तबलची, बेंजो मास्टर, ढोलकाहा मन घलो पधारे रिहिस।
फलदान के बेरा लीला के महराज ह दोहा अउ चौपाई पढ़े- मंगल भवन अमंगल हारी, कबहू सुदसरत अजिर बिहारी राम सियाराम राम सियाराम जै जै राम। राधे दुरपती के फलदान होवे सबो संगी संग राम लीला मंडली ह आवे राम सियाराम जै जै राम।
अइसन बखत म हॉसी मजाक तो होते रिथे फेर जइसन सगा रिहिस तइसन हासी मजाक चलिस। दुरपती अउ राधे के फलदान निपटगे। संझा होवथे किके सबे झन रेसल खोली म चल दिस। रात कन फेर लीला सुरु होइस। दुरपती ह अपन सहेली मन संग देखे बर बइठे हे।
राम के पाठ आथे त दुरपती के सहेली मन किथे मुड़ी ल ढांक न वो तोर कूराससुर ह आगे। दुरपती के दूपट्टा ल धरिस अउ मुड़ी ढांक दिस। लछमन के पाठ आवे त दुरपती ह लाज के मारे मुड़ी ल गड़िया लेवे। वोकर सहेली मन राम लीला देखे ल छोड़के दुरपती संग दिल्लगी लगाय।
सहेली मन के घेरी-बेरी के दिल्लगी म दुरपती ह खिसीयागे अउ रात के बेरा म लीला ल आधा छोड़के उठगे। अपन धुन म घर कोत रेगिस। घर के आगू म थोकुन कोलकी परथे। कोलकी ह कुलूप अंधियार रिथे। जइसे कोलकी मेर पहुंचथे दू झन मंदहा मन मंद के नसा म बपरी ल बिलई कस झपट देथे।
राधे के पिरीत म मगन दुरपती ह घर आवत रिहिस, का जानय बिचारी ह कलजुग के दुरयोधन मन मेड़री मारे बइठे हे तेला। गजब चिख पुकार मचइस फेर कोनो मदद बर नइ अइस। लीला के पोंगा के गोहार म दुरपती के पुकार दबगे। द्वापर के दुरपती ल तो भगवान किसन बचा ले रिहिस। कलजुग के नारी ल कोन बचावे। तलफत केवंची करेजा कांपगे। निरदई राकछत मन मुरछा देह ल छोड़के भागगे।
आधा रात के लीला सिरइस त पारा के मन लहुटिस। अंधयारी कोलकी म काहरत जीव देखके सबो के सांस अरहजगे। लकर-धकर तिर म जाके माचिस बार के देखिस, सबके नजर म दुरपती हमागे। बपरी के हालत ल देख के सबो अनहोनी ल भांप डरिस।
धरा पछरा कपड़ा लपेट के असपताल लेगिस। कोनो झन जाने किके घर के मन चोरी लुका इलाज पानी कराइस। मुंह लूकावत अपने छइहा ल डर्रावत दुरपती ह चार दिन म घर आइस। गांव भर म बात बगरगे रिहिस। दुरपती के घर वाला मन अतियाचारी के नाव ल बकरे ल किहिस। फेर डर के मारे नाव नइ बता सकत रिहिस।
लोक लाज के डर म दुरपती ह अपन जीव देबर एक दिन अपने देह म माटी तेल रुको डरिस। माचिस जियाते रिहिस ततके म ठुक ले राधे ह आगे। हाथ ले माचिस नंगा के फेकिस अउ दुरपती के हाथ थाम के किथे- ये विपदा के बेरा म घलो मेे तोर साथ हवं, निच के छुये म तोर मास बस्सा नइ गे। वो अंधयारी रात ल तै सपना समझ के भुला जा। तै जब किबे तब मे तोर संग बिहाव करे बर तियार हवं। फेर बदला म तोला ओकर नाव बताय ल परही। राधे ल संग म पाके दुरपती के बल बाड़गे। हिम्मत कर के मुंह खोलिस। ठेठवार के दूनो दरवाहा टूरा के नाव ल बकरिस। बउराय बरन पारा मोहल्ला के मन दूनो टूरा ल नंगत छरीस। गांव के सियान मन पंचइत म फैसला कराबो कइके छोड़ा दिस नइते जीये ले डरतिस।
पंचइत बइठिस त ठेठवार ह अपन टूरा के करनी के समाज म माफी मांगिस। ठेठवार मुड़ी नवाय किथे टूरा मन ह गुनाह करे हे तेकर सजा भोगे बर तियार हन जेन भी पंचइत के फैसला होही हमला मंजूर हे।
पंचइत ह अपन फैसला सुनइस के आज ले तुहर गांव निकाला हे। अपन घर दुवार ल छोड़ के तूमन ल जाय ल परही। अउ फेर लहूट के ये गांव म झन आहू। सरपंच अउ पंच के ये फैसला म सबे झन हामी भरिन। फेर दुरपती ल येहा मंजुर नइ रिहिस।
दुरपती किथे- ये मन ल गंाव निकाला झन देव। इहा ले निकल के अऊ कोनो गांव म जाके हांसी खुसी ले रही। अउ मउका पाके फेर कोनो म नियत गड़ाही। ये सजा ह येकर मन बर मुनासीब नइ हे।
गांव के मुखिया किथे- येमन ल का सजा दे जाय बेटी तही ह बता। तोर गुनेगार ल तही ह सजा दे।
दुरपती किथे- येमन ल गांवे म राहन दव। आज ले इकर पौनी पसारी बंद अउ गांव म रइ के भी गांव के समाज ले बाहिर रही। मेहा जेन अपमान के आगी म जरे हवं ओकर आंच इहू मन ल मिलना चाही। गांव म रही त रोज अपमान के अंगरा म जरही।
अउ एक ठन सजा मे सरी गांव ल देना चाहत हवं। जेन दारु के नसा म मोर गत बिगड़िस। आज ले वो दारु के दूकान ल बंद करा दव मोर अतकचे बिनती हे। दुरपती के ये बिचार ह सबो ल बने लागिस। नियाव के तुरते अमल होगे। ठेठवार के टूरा मन ल उकर करनी के सजा मिलगे। जेन दारु के सेती घर परिवार के गत बिगड़थे नोनी बाबू मन बिगड़थे वो दारु के दूकान बंद होगे।
दुरपती के नियाव म करइया कइवरया दूनो ल सजा मिलगे। राधे के चरन छू के दुरपती किथे मोला बल तोरे ले मिलिस। कहू तै मोला नइ अपनाए रितेस त आज मैं अपमान के अंगरा म जर के भुंजा जाए रितेव। तूमन तो मोर भगवान आव।
अतका ल सुन के राधे किथे अभी मे भगवान नइ हवं। लीला म बनथव। चल घर संझा होवथे लीला के तियारी करना हे। अभी तो लछमन ल सक्ती बान, मेंगनाथ वध, रावन दहन बांचे। रावन के मरे के बाद राम के राज तिलक होही अउ लीला सिराही। अतका म गांव के सियान मन घलो उकर पंदउली देथे अउ किथे तेकर पाछू राधे अउ दुरपती के बिहाव होही।
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लेखक - जयंत साहू 
पता- ग्राम डूण्डा, पोस्ट- सेजबहार
जिला/ तह. रायपुर छ.ग. 492015 
मो. 9826753304
jayantsahu9@gmail.com

मइके के सुरता

छत्तीसगढ़ी कहानियॉ भाग सात - मइके के सुरता

फूफू  के लिगरी म सातो ह भाई मन करा बांटा मांगे बर उमियागे। पंचइत सकेल के अपन ददा के जहिजाद म हिसा मांगिस। नित नियाव म लड़के सातो ह अपन ददा के जहिजाद म हिसा पा लिस। फेर बपरी के जीयत भर बर मइके के मया छुटगे। आगी लगे अइसन नियाव म जोन मया ल टोरथे। कीरा परय ऊकर मति म जेमन धन के पाछु मया जोरथे।
बिहाव के पाछु बेटी-माई ल मइके ले एक लोटा पानी के आस रइथे। तीजा पोरा अउ मातर मड़ई म नेवता हिकारी के अगोरा रइथे। तथे तो मइके के कुकुर ल घलो ससुरार म भाई बरोबर मान गवन करथे। सातो ह मुहांटी म बइठे-बइठे अपन तीजा लेवइया के अगोरा करत बइठे हे। येहु साल आए के आस तो नइ हे फेर का करबे सातो के मन मानबे नइ करय।
अपन दुवार म बइठे सातो ह सबो के लेगईया ल आवत-जावत देखत हे। सातो के मन के लालच के तेलई म मइके के सुरता डबके लागथे। सुरता म चुरत मन फुसुक-फुसुक रो परथे। गोहार पार के रोए म ओकरे फदित्ता होही। बपरी ल कोनो पुछ परही त का बताही। फूफू  ह अपन लालच बर सातो के मति बिगाड़े रिहिस। भाई-बहिनी अउ ननंद-भउजी के नता म जोझा पारे रिहिस। सातो ह मने मन अपन करम ल कोसत आजो तीजा लेवईया अगोरत हे।
सातो ह नहां खोर के बिहनिया ले तियार होगे। अलवा जलवा मुड़ी कोरे लकर-धकर नंदिया खड़ के पिपराही म आके बइठे हे। अवइया-जवइया मन ल टुकूर-टुकूर देखत हे। भादो के महीना म नंदिया ह मुड़ भर बोहावत रिहिस। नंदिया नरवा ह कातको जोझा पारे तीजा मनईया मन तो जा के रही। देवता बरोबर डोंगहार ह सबे झन ल ए पार ले ओ पार नहकावत हे। बांस भर पानी म तउरत डोंगा म सवार तिझयारिन मन ल देख-देख के सातो के मन निचट उदास होगे हे।
पछतावा के आंसू ले बोट बोटाय सातो के आंखी म नंदिया के ओ छोर ले डोंगा चड़हत अपन भाई दिखीस। पिपराही ले रटपटा के उठीस अउ चुंदी मुड़ी ल संवारत नंदिया कोती दऊड़गे। सातो के हांसी खुसी के ठिकाना नइ हे। नंदिया के छोर म खड़े अपन भाई के अगोरा करत पउर साल के तीजा ल सोरियावत हे।
सातो के दादा ह अपन बड़े बेटा पुनऊ ल किथे- सातो ल तीजा लाने बर आठे मान के चल देबे रे। आंहू किही त संग म लान लेबे। निंदई कोड़ई के दिन घलो चलत हे। दमांद कर जादा जोर-जबरई झन करबे। अब आज काल तो सब पोरा मान के आथे-जाथे। नंदिया नरवा के कारो बार अगवाके रेंग जबे।
उंचकहा मुंहा पुनऊ अधरसट्टी सुनिस। आठे मान के कांहा आठे के एक दिन अगाहू रेंग गे। पुनऊ ल सातो घर जाय बर पुचपुचाए। बारी म बोवाए खीरा ल झोला भर टोरिस। करेला अउ डोड़का के एकक ठन मोटरी गठिया के निकलगेेे सातो घर जाए बर।
पुनऊ अउ सातो के नानपन के हांसी दिल्लगी ह बर बिहाव होय के बाद घलो नइ छुटे रिहिस। संगे बर बिहाव होइस, संगे दूनो के गवन पठउनी होगे। सातो के ददा ह गांव के बड़का किसान रिहिस। घर म चीज बस कांही के खंगता नइ रिहिस। गांव म ऊंकरे सुती चले ते पाय के पुनऊ ह थोकिन अड़दली रिहिस।
ददा ह जाय ल केहे हे किके बारी ले घर नइ अइस मोटरी धरे सोज सातो घर रेंग दिस। घर ले बता के जातिस त भउजी ह रोटी पीठा जोरतिस। ददा ह बारी म गोठियइस सातो घर जाबे किके। पुनऊ ह कोनो ल आरो करे बिगर मोटरी भर साग भाजी धरके निकलगे। पुनऊ ह पैडगरी रद्दा म अकेल्ला रेगंत झोला के खीरा ल खावत-खावत जावत रिथे। नंदिया खड़ के पहुचत ले झोला ल अपने ह अधिया डरथे। सातो ल देहू किके आधा झोला खीरा ल बचाय घाट म पहुंचे हे। किंजर-किंजर के डोंगा देखत हे। काम कमई के दिन म डोंगा घलो कम चलत रिहिस। एके ठन डोंगा वाला रिहिस। उहू ह वो पार खड़े रिहीस।
कांहा डोंगा अगोरत रइहा किके पुनऊ ह मुड़ भर बोहावत नंदिया ल तऊर के नाहक गे। दूनो हाथ म एकक ठन मोटरी ल धरे हे। खीरा के झोला ल टोटा म अरोय हे। पार म नाहक के सबो समान ल टमड़िस। करेला अउ डोड़का के मोटरी तो बने रिहिस फेर खीरा ह बोहा गे रिहिस। पुनऊ ह सालेच के झोला भर खीरा धरके निकलथे। कोनो साल अपने ह खाते खात सिरवा डरथे। त कोनो साल नंदिया म बोहा जए। सातो ह करेला अउ डोड़कच ल पाथे।
कच्चा-कच्चा कुरता ल पहिने पुनऊ ह सातो घर पहुचिस। भाई ल देखके सातो ह मगन होगे। लोटा भर पानी दिस अउ पावं परिस। सुख्खा गमछा म मुड़ी कान ल पोछिस। पुनऊ ह मोटरी ल लमावत किथे- येदे बहिनी करेला अउ डोड़का लाने हवं। सातो किथे- खीरा घलो तो फरे होही भाई। खीरा काबर नइ लानेस। अतका ल सुन के पुनऊ ह दुच्छा झोला ल लमा देथे। दुच्छा झोला ल देख के सबो झन कठल के हांसथे।
अपन भाई के सुध म मगन हे सातो। खुशी के आंसू ल पोछथे अउ हांसत हांसत किथे- यहू साल एको ठन नइ बचाय भाई। कइसे पुनऊ भाई कलेचुप काबर हस। जब आथस तब दुच्छा झोला देखाथस। कहां करथस मोर बाटा के खीरा ल। सातो के गोठ ल सुन के डोंगा ले उतरत अनगइहा सगा ह सातो ल किथे- कोन ल काहत हस वो। मंै तो तोला नइ चिनहत हवं। अतका ल सुन के सातो के मन के भरम टुटगे। सातो ह अनचिनहार ल अपन भाई जान के गजब आस लगा डरे रिहिस।  उही आस के धुंधरा म ओला अनगईहा ह भाई दिखत रिहिस। बपरी ह निरास होके आंसू ल पोछत फेर पिपराही म लहुटगे।
सातो के मन म का बितिस होही जब अनचिनहार ल भाई जान के मया लड़ावत रिहिस। उहू अनगइहा ह नइ चिनहवं कइ दिस। एक घाव बहिनी की देतिस त ओकर का बिगड़ जतिस। सातो अपन मन मढ़ावत किसमत ल कोसत हे। आखिर गलती तो ओकरो कोती ले होए हे। सबो बने बने चलत रिहिस। एक दिन अचानक सातो के ददा बितगे। ददा के बिते के पाछु पुनऊ ह बहिनी ल बेटी बरोबर मया दुलार करे। तीजा पोरा म पुछे-गउछे। भउजी घलो सातो ल नोनी ले आगू एक भाखा नइ बोलत रिहिस। आगू के आगू ओकर बर लुगरा पाटा लेवत रिहिस। इही बात ह पुनऊ के फूफू  ल नइ सुहइस। पुनऊ करा अपन भाई के जहिजाद म हिसा मांगे बर आगे। पुनऊ मन एक भाई एक बहिनी हे ओइसने ओकर ददा मन घलो एक भाइ एक बहिनी रिहीस। झगरा लड़के फूफू  ह अपन नता तो टोरिस संग म सातो ल घलो जुझो दिस।
फूफू  ह घेरी बेरी सातो घर जाके ओकर भउजी के लिगरी लगावत काहय- सातो तोर भउजी ह सबे चीज बस ल अपन मइके म लेग-लेग के जोरत हे। तोर भाइ ह सिधवा हे अउ भउजी चाल बाज। चीज बस के राहत ले पुछत हे। सिरावन तो दे कुकुर नइ पुछे तोला। फूफू  ह तो अपने घर के आए अउ भउजी ह पर घर ले आए हे। इही सोच के सातो ह घलो फूफू  के बात म आगे अउ जुरे पंचइत म बाटा बर खड़ा होगे।
सातो मने मन गुनत हे। बाटा नइ मांगे रइतेवं त आज मोरो भाई लेगे बर आए रितिस। भउजी ह तीजा के जोरा करतिस। गुनते गुनत सातो ल पिपराही म बइठे बिहनिया ले संझा होगे रिहिस। सातो ह अपन मन ल मारत घर आए बर उठिस। रोनमुहा मुंह धरे घर जाना बनो नोहे किके सातो ह नंदिया के तिर म गिस। माड़ी भर म उतर के ठोमहा म पानी लेके मुह ल धोइस।
नंदिया भीतर ले मुंह धो के लहुटत रिहिस तभे सातो के पांव कुछू जिनिस अभरिस। हांथ ल बुड़ो के टमड़िस त सातो ल दू ठन मोटरा मिलिस। मोटरा भीतर म करेला अउ डोड़का बंधाय रिहिस। दूनो मोटरा ल धर के सातो पार म आवत रिहिस तभे आगू म एक ठन दुच्छा झोला बोहावत रिहिस। 
दुच्छा झोला अउ मोटरी ल पाके सातो के खुसी के ठिकाना नइ रिहिस। भाई नइ अइस त का होगे। भाई के चिनहा ह आगे। मइके के सुरता म उदास मन ल मढ़ावत सातो ह अपन घर लहुटगे। दुच्छा झोला ल धरे सातो घर म जाथे। घर म ओकर पुनऊ भाई चरिहा भर करेला अउ डोड़का ल धरे दुवारी म बइठे राहय। जाते साठ सातो ल किथे ते कहा गे रेहे बहिनी घर म तारा लगके। भांची अउ भांटो मन कहा हे। ओकर आंखी ल परतित नइ होत रिहिस कि सिरतो म पुनऊ भाई आगे हे। बोकबाय सातो ल हलावत पुनऊ किथे ते फेर खीरा बर नराज होगे का बहिनी। अतका ल सून के सातो के चेत आगे। पुनऊ अउ सातो बिते बखत ल भुलाके फेर तीजा के फरहार खईन।
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